शहीद ऊधम सिंह: 21 साल का इंतजार और जलियांवाला बाग के गुनाहगार से बदला लेने वाले अमर क्रांतिकारी

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं महान सपूतों में एक अमर नाम शहीद ऊधम सिंह का है, जिन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के घाव को वर्षों तक अपने दिल में संजोए रखा। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार का जवाब उन्हीं की सरजमीं पर जाकर दिया और पूरी दुनिया को संदेश दिया कि भारत अपने शहीदों का बलिदान कभी नहीं भूलता।

प्रारंभिक जीवन और कठिन परिस्थितियां

शहीद ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के कारण वे और उनके भाई अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में पले-बढ़े। कठिन और विषम परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और अपने भीतर राष्ट्रप्रेम की ज्वाला को प्रज्वलित रखा।

जलियांवाला बाग नरसंहार: जीवन की नई दिशा

13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुए जघन्य नरसंहार ने ऊधम सिंह के जीवन का उद्देश्य ही बदल दिया। बैसाखी के दिन निहत्थे और मासूम भारतीयों पर ब्रिटिश शासन द्वारा गोलियां चलवाई गईं, जिसमें सैकड़ों बेकसूर लोग मारे गए। इस दर्दनाक घटना ने ऊधम सिंह के मन में गहरा आक्रोश भर दिया। उन्होंने उसी क्षण संकल्प लिया कि वे इस नरसंहार के मुख्य जिम्मेदार को न्याय के कटघरे तक जरूर पहुंचाएंगे।

21 साल का धैर्य और लंदन में ऐतिहासिक बदला

अपने संकल्प को पूरा करने के लिए ऊधम सिंह ने लगभग 21 वर्षों तक धैर्यपूर्वक सही अवसर का इंतजार किया। 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में आयोजित एक बैठक के दौरान, ऊधम सिंह ने पंजाब के तत्कालीन पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर को गोली मारकर ढेर कर दिया। ओ’ड्वायर ही जलियांवाला बाग कांड का मुख्य सूत्रधार था। गिरफ्तारी के बाद भी ऊधम सिंह के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था, बल्कि देश के प्रति गर्व की भावना थी।

हंसते-हंसते शहादत और अमर विरासत

ब्रिटिश अदालत द्वारा मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद, 31 जुलाई 1940 को लंदन की पेंटनविल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। वर्ष 1974 में उनके पार्थिव अवशेष भारत लाए गए और पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। शहीद ऊधम सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। उनका साहस, धैर्य और राष्ट्रप्रेम आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

Jantak khabar
Author: Jantak khabar

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