ट्रम्प का $100,000 H-1B शुल्क: भारत पर बड़ा असर, अमेरिका की इनोवेशन बढ़त पर भी खतरा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शुक्रवार को एक कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर कर H-1B वीज़ा व्यवस्था में बड़ा बदलाव कर दिया। नए नियम के तहत अब किसी भी व्यक्ति को H-1B वीज़ा के लिए आवेदन करते समय 100,000 डॉलर (लगभग 83 लाख रुपये) का शुल्क देना अनिवार्य होगा। यह आदेश 21 सितम्बर 2025 को अमेरिकी समयानुसार 12:01 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 9:31 बजे) से लागू हो जाएगा।
व्हाइट हाउस का दावा है कि यह कदम अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करेगा और सुनिश्चित करेगा कि केवल “सबसे योग्य” विदेशी पेशेवर ही अमेरिका आ सकें। लेकिन इस भारी शुल्क का सबसे बड़ा असर भारतीय पेशेवरों पर पड़ेगा।

भारत पर सबसे ज्यादा असर
भारतीय पेशेवर H-1B वीज़ा कार्यक्रम में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं। हाल के वर्षों में कुल H-1B अनुमोदनों में से करीब 71–73 प्रतिशत भारत के हिस्से में आए हैं, जबकि चीन की हिस्सेदारी सिर्फ 11–12 प्रतिशत रही है। वित्त वर्ष 2024 में भारतीयों को लगभग 2.07 लाख H-1B वीज़ा मिले थे।
नए शुल्क के लागू होने से अनुमानित 60,000 भारतीय पेशेवरों पर तुरंत असर पड़ेगा, जिससे सालाना बोझ करीब 6 बिलियन डॉलर (लगभग ₹53,000 करोड़) का होगा। यदि यह नियम सभी पर लागू हुआ तो भारत का वार्षिक बिल ₹1.8 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
मध्यम स्तर के भारतीय इंजीनियर, जो अमेरिका में लगभग $120,000 सालाना कमाते हैं, उनके लिए यह शुल्क वेतन का 80 प्रतिशत तक खा जाएगा। ऐसे में प्रवास केवल उच्च वेतन पाने वाले पेशेवरों के लिए ही संभव होगा।
अमेरिकी टेक और भारतीय आईटी कंपनियों पर असर
इन्फोसिस, टीसीएस, विप्रो, एचसीएल और कॉग्निजेंट जैसी भारतीय आईटी कंपनियां लंबे समय से अमेरिकी प्रोजेक्ट्स के लिए हजारों इंजीनियर ऑनसाइट भेजती रही हैं। लेकिन $100,000 शुल्क के बाद कंपनियां केवल उच्च स्तरीय या विशिष्ट परियोजनाओं के लिए ही स्टाफ भेज पाएंगी।
इससे अमेरिकी क्लाइंट लोकेशंस पर काम भेजने की बजाय कंपनियां भारत या कनाडा, मेक्सिको जैसे नजदीकी केंद्रों से काम करवाने का मॉडल अपनाने पर मजबूर हो सकती हैं।
अमेरिकी बड़ी टेक कंपनियां भी इस फैसले से अछूती नहीं रहेंगी। 2025 की पहली छमाही में ही अमेज़न और AWS को 12,000 से ज्यादा H-1B मंजूरियां मिली थीं, जबकि माइक्रोसॉफ्ट और मेटा ने 5,000 से ज्यादा वीज़ा हासिल किए। बैंकिंग और टेलीकॉम सेक्टर भी इस फैसले से प्रभावित होंगे।
कानूनी चुनौतियां और विवाद
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इतना बड़ा शुल्क अदालत में चुनौती झेल सकता है। अमेरिकी इमिग्रेशन काउंसिल के आरोन राइकलिन-मेलनिक ने कहा कि “कांग्रेस ने सरकार को केवल आवेदन प्रक्रिया की लागत वसूलने का अधिकार दिया है, $100,000 जैसे भारी शुल्क लगाने का नहीं।”
व्हाइट हाउस का तर्क
प्रशासन का कहना है कि H-1B वीज़ा का दुरुपयोग रोकने और अमेरिकी युवाओं को मौका देने के लिए यह कदम उठाया गया है। ट्रम्प ने कहा कि कंपनियों को विदेशी सस्ते टैलेंट की बजाय अमेरिकी ग्रेजुएट्स को प्रशिक्षित कर नौकरी देनी चाहिए।
आगे क्या होगा?
हर साल 85,000 H-1B वीज़ा लॉटरी से जारी होते हैं। शुल्क बढ़ने से छोटे नियोक्ता और नए ग्रेजुएट्स आवेदन करने से पीछे हट सकते हैं।
अगर शुल्क हर साल देना पड़ा, तो तीन साल के कार्यकाल में एक कर्मचारी पर कंपनी का खर्च $300,000 तक पहुंच सकता है। इससे कई भारतीय पेशेवरों को वापस लौटने पर मजबूर होना पड़ सकता है और ग्रीन कार्ड की राह और कठिन हो सकती है।
कुल मिलाकर, H-1B अब एक व्यापक स्किल्ड वर्कर वीज़ा से बदलकर केवल उच्च वेतन और अत्यधिक विशिष्ट पेशेवरों के लिए एक एक्सक्लूसिव रास्ता बन सकता है।

























