चंडीगढ़। पंजाब की राजनीति में सोमवार को बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब पूर्व राज्य मंत्री और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के वरिष्ठ नेता अनिल जोशी ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। उनके पार्टी में आने को कांग्रेस, खासकर माझा क्षेत्र के लिए, एक बड़ा राजनीतिक लाभ माना जा रहा है।
चंडीगढ़ में आयोजित समारोह के दौरान अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और पंजाब मामलों के प्रभारी भूपेश बघेल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वारिंग और विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने उन्हें पार्टी में शामिल कराया।

अनिल जोशी का राजनीतिक सफर
अनिल जोशी पंजाब की राजनीति में एक प्रमुख हिंदू चेहरे के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत भाजपा से की थी और अमृतसर उत्तर से दो बार विधायक चुने गए। 2012 से 2017 तक वे अकाली-भाजपा सरकार में स्थानीय सरकार और मेडिकल एजुकेशन जैसे अहम विभागों के मंत्री भी रहे।
जुलाई 2021 में भाजपा की कृषि कानूनों पर आलोचना करने के चलते उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद वे अकाली दल में शामिल हुए, लेकिन नीतिगत मतभेदों के चलते 2024 में इस्तीफा दे दिया। हालांकि जून 2025 में उन्होंने फिर से अकाली दल में वापसी की, लेकिन अब उन्होंने कांग्रेस का रुख कर लिया है।
कांग्रेस को क्या मिलेगा फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जोशी के कांग्रेस में आने से पार्टी को अमृतसर समेत पंजाब के शहरी इलाकों में मजबूती मिलेगी। उनके अनुभव और संगठनात्मक पकड़ से कांग्रेस को चुनावी मैदान में बढ़त मिल सकती है।
सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस उन्हें आगामी तरनतारन उपचुनाव में उम्मीदवार भी बना सकती है। हालांकि, जोशी के करीबी सहयोगियों ने बताया कि उन्होंने बिना किसी शर्त के कांग्रेस जॉइन किया है और उनका विश्वास पार्टी की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा और राहुल गांधी के नेतृत्व में है।
अनिल जोशी का यह फैसला पंजाब के राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दे सकता है और आने वाले चुनावों में बड़ा असर डाल सकता है।

























