नई दिल्ली: 23-8-25 jantak khabar
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बिहार में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने को लेकर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने चुनाव आयोग और राज्य सरकार दोनों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यह मामला न केवल “लोकतंत्र की बुनियाद को हिलाने वाला” है, बल्कि इससे नागरिकों का चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास भी डगमगाता है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन नागरिकों के नाम लिस्ट से हटा दिए गए हैं, वे अब ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से पुनः आवेदन कर सकते हैं।
अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
👉 “वोट डालना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अगर बड़ी संख्या में नाम बिना उचित कारण हटाए जा रहे हैं, तो यह प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।”
पुरानी घटनाओं का हवाला
यह पहली बार नहीं है जब वोटर लिस्ट से नाम कटने पर सवाल उठे हों।
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2019 लोकसभा चुनाव: कई राज्यों से शिकायतें आई थीं कि मतदाता केंद्र पर पहुँचने पर उन्हें पता चला कि उनका नाम लिस्ट में नहीं है।
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2020 बिहार विधानसभा चुनाव: चुनाव आयोग को हजारों शिकायतें मिली थीं कि मतदाता कार्ड होने के बावजूद नाम लिस्ट से गायब था।
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2023: विपक्षी दलों ने दावा किया था कि बिहार में जानबूझकर लाखों नाम हटाए गए, जिससे खास समुदाय प्रभावित हुआ।
इन घटनाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “अब ज़रूरी है कि आयोग और सरकार इस प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए और लोगों को शिकायत दर्ज करने का आसान प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए।”
आगे क्या?
अदालत ने चुनाव आयोग से जल्द रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है और यह सुनिश्चित करने को कहा है कि:
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किसी भी नागरिक का नाम बिना नोटिस दिए लिस्ट से न हटाया जाए।
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हर जिले में शिकायत निवारण केंद्र बने।
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प्रभावित लोग ऑनलाइन पोर्टल के जरिए आसानी से आवेदन कर सकें।
निष्कर्ष
इस मामले ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की चुनावी प्रक्रिया सच में इतनी मजबूत है कि हर नागरिक का अधिकार सुरक्षित रह सके। सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख से अब उम्मीद है कि बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में मतदाता सूची को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जाएगा।
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