अवैध और वैध दोनों तरीकों से पेड़ कटने का सिलसिला जारी
हिमाचल प्रदेश में दशकों से पेड़ों के कटने की समस्या गहराती जा रही है। न केवल अवैध, बल्कि वैध तरीके से भी बड़े पैमाने पर पेड़ कटे जा रहे हैं, जिससे हरित आवरण लगातार कम हो रहा है। 2023 में थुनाग बाजार में भारी मात्रा में लॉग बहते मिले, जबकि जून में पंडोह डैम में कई टन लकड़ियां बहती देखी गईं। इसके बावजूद वन विभाग ने इसे अवैध कटान नहीं माना।
उखड़ते पेड़ और बढ़ता खतरा
हिमाचल प्रदेश को उत्तर भारत का फेफड़ा कहा जाता है, लेकिन लापरवाही के चलते वन क्षेत्र कमजोर होता जा रहा है। विकास परियोजनाओं के नाम पर हो रहे कटान के बदले में उचित पौधरोपण नहीं हो रहा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यही कारण बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं के पीछे हैं। हाल ही में रावी-ब्यास नदी और अन्य नालों में बहकर आईं हजारों टन लकड़ियों ने पहाड़ों की बिगड़ती स्थिति उजागर की।

सैटेलाइट मैपिंग के बावजूद गंभीरता नहीं
पर्यावरण कार्यकर्ता देवेन खन्ना ने बताया कि धर्मशाला और शिमला में अवैध पेड़ कटान की शिकायतें की गई थीं। हाईकोर्ट के आदेश पर सैटेलाइट मैपिंग की मांग की गई, लेकिन वन विभाग ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। कोटी में काटे गए 400 पेड़ों के मामले में केवल वन रक्षक को निलंबित कर दोषी माना गया, जबकि उच्च अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी।
विशेषज्ञों की राय: जांच आवश्यक
शोधकर्ता मानशी आशर का कहना है कि पंडोह डैम और रावी नदी में बहकर आए पेड़ों का स्रोत स्पष्ट होना चाहिए। यह अवशेष हैं या अवैध कटान, इसकी सही जांच जरूरी है। पर्यावरणविद संदीप मिन्हास ने चेतावनी दी कि वन क्षेत्र घटने से प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। अंधाधुंध कटान और प्रोजेक्टों के लिए गलत तरीके से पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे भूस्खलन और नुकसान हो रहा है।
सामुदायिक भागीदारी पर जोर
डॉ. संदीप शर्मा, निदेशक हिमालयन वन अनुसंधान संस्थान शिमला का कहना है कि पेड़ कटान रोकने और पौधरोपण के लिए सामुदायिक सहभागिता आवश्यक है। लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। क्षेत्र विशेष के लिए उपयोगी पेड़ वहीं लगाए जाएं ताकि जलवायु संतुलित बनी रहे और आपदाएं कम हों।
सरकार भी गंभीर
वन निगम के उपाध्यक्ष केहर सिंह खाची ने कहा कि अवैध कटान पर सरकार पूरी तरह गंभीर है। हालांकि, केंद्र से अपेक्षित मदद नहीं मिलने के कारण जंगलों की स्थिति सुधारना चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है। लेकिन जो लकड़ियां बहकर आईं हैं, उनमें अवैध कटान के स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिले हैं।

























